Thursday, January 27, 2011

आर्थिक विषमता बड़ा ख़तरा

दावोस आर्थिक मंच की रिपोर्ट के अनुसार वैश्वीकरण की वजह से दुनिया भर में तेज़ी से आर्थिक उन्नति हुई है लेकिन उससे पैदा हुई संपन्नता कुछ ही हाथों और क्षेत्रों में जमा होती जा रही है. इससे देशों के बीच और देशों के भीतर आर्थिक विषमता बढ़ती जा रही है जिसके कारण पिछड़ापन, भ्रष्टाचार, अस्थिरता और आतंकवाद जैसी समस्याएँ पनप रही हैं.

वैश्वीकरण की वजह से समस्याएँ भी विश्वव्यापी हो गई हैं. लेकिन उनसे निपटने के लिए बनी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ, संधियाँ और नेटवर्क, राष्ट्रीय और राजनीतिक हितों के टकराव के कारण भोथरे और नाकाम साबित हो रहे हैं. असरदार अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण और अंकुश के अभाव में आर्थिक विषमता, भ्रष्टाचार और अपराध पर लगाम कसना कठिन हो रहा है.

विश्व आर्थिक मंच का संमेलन हर साल जनवरी के अंत में दावोस में होता है और इसमें दुनिया के बड़े-बड़े उद्योगपति, नेता और अर्थशास्त्री भाग लेते हैं. संमेलन से पहले हर साल एक जोख़िम रिपोर्ट प्रकाशित की जाती है जिसमें विश्व की आर्थिक चुनौतियों को रेखांकित किया जाता है ताकि उन पर व्यापक चर्चा हो सके. पिछले वर्ष की रिपोर्ट में यूरोपीय देशों के ऋणसंकट को एक बड़ा ख़तरा बताया गया था जो अभी तक टला नहीं है.

इस साल की जोख़िम रिपोर्ट कुल मिला कर 6 ऐसे ख़तरों को रेखांकित करती है जिनका असर विश्व व्यापी हो सकता है. ये हैं, राजस्व संकट, भौगोलिक-राजनीतिक संकट, जलवायु परिवर्तन, ईंधन मूल्यों के उतार-चढ़ाव, आर्थिक विषमता और विश्व संस्थाओं की विफलता. इनमें से आर्थिक विषमता और विश्व संस्थाओं की विफलता बाक़ी के सभी ख़तरों को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती है. इसलिए इन दोनों को सबसे बड़ ख़तरा माना गया है.

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