Thursday, January 20, 2011

मैं मजबूर हूं, मेरे बच्चे खरीद लो

अपनी जमा पूंजी पत्नी के इलाज पर लगा दी. पत्नी की देखभाल करने के लिए दिहाड़ी छूट गई. हालत यह कि गैर जिम्मेदार स्वास्थ्य व्यवस्था ने पीजीआई के नेफ्रोलॉजी डिपार्टमेंट के वार्ड नंबर 4 में पत्नी के बेड के पास बैठे देसराज को घुट-घुट कर जीने पर मजबूर कर दिया.

डाक्टरों ने गलत खून चढ़ाकर न केवल उसकी पत्नी के गर्भ में पल रहे शिशु की जान ले ली, बल्कि उसकी दोनों किडनियां भी खराब कर दीं. देसराज के सामने संकट है कि वह पत्नी के इलाज के लिए महंगी दवाएं खरीदे या फिर तीन मासूम बच्चों की भूख और पढ़ाई का इंतजाम करे. पीजीआई में सहमा देसराज अब अपने जिगर के टुकड़ों यानी तीनों बच्चों को बेचना चाहता है.

देसराज को दुख इस बात का है कि प्रशासन ने उसकी पत्नी की जिंदगी के साथ खिलवाड़ करने वालों को सस्पेंड तो कर दिया, लेकिन उसकी पत्नी की जिंदगीभर की दवाओं के खर्चे की सुध लेने का होश अभी तक नहीं आया. देसराज को कोई मुआवजा भी नहीं मिला. देसराज की बीवी सुमन पिछले एक महीने से पीजीआई में बिस्तर से उठ नहीं पा रही.

डॉक्टर बताते हैं कि सुमन ठीक हो जाएगी लेकिन कब तक, यह कोई नहीं बता सकता. सुमन उठकर चलने भी लगी तो जिंदगीभर किडनी को इन्फेकशन से बचाने के लिए महंगी दवाओं की जरूरत पड़ेगी. पीजीआई में दिक्कतों का सामना करते देसराज को बलजीत सिंह जैसे मददगारों का साथ मिला. देसराज कहते हैं कि उसे ऐसे लोगों की मदद मिले तो उसकी बीवी की जान बच सकती है.

बच्चों को खाना दूं या बीवी को दवा
देसराज को जिंदगीभर बीवी के लिए दवाएं लेनी पड़ेंगी. तीनों बच्चों विकास, ज्योति और आकाश की पढ़ाई के साथ रोटी भी जुटानी है. देसराज कहता है कि अपनी दिहाड़ी से किसी तरह बीवी के लिए दवाएं तो ले लूंगा लेकिन बच्चों का पेट भरने और पढ़ाई का खर्चा दिहाड़ी से नहीं हो सकता है. अब बच्चों को बेचकर इस समस्या से निकल सकता हूं. इससे बच्चों को रोटी भी मिल जाएगी और पढ़ाई भी होती रहेगी.

खत्म हो गया है राशन 
पिछले साल 15 दिसंबर से लेकर अभी तक बच्चे पड़ोसियों के पास थे. कुछ राशन भी दिया था तो बच्चों को रोटी मिल रही थी. लेकिन अब पड़ोसी भी हाथ खड़े कर रहे हैं. बाप के लिए इन बच्चों का पालन पोषण करना मुश्किल हो गया.

No comments:

Post a Comment