Monday, January 24, 2011

बस दोस्त चाहिए...

आज तमाम संबंधों पर दोस्ती भारी पड़ने लगी है। खून का रिश्ता भी इसके सामने फीका पड़ रहा है। समय के साथ दोस्ती की नींव और मजबूत ही होती जा रही है। वामपंथियों के समर्थन वापसी के बाद जब पूरे देश की निगाहें केंद्र सरकार के भविष्य पर लगी थीं, तब एक 'दोस्तों का दोस्त' देश के नंबर वन पॉलिटिकल फैमिली से अपनी दुश्मनी भुलाकर अपने एक अजीज मित्र के दुश्मन भाई की राहें मुश्किल कर रहा था, ताकि अजीज मित्र की व्यापारिक मुश्किलें आसान हों। जी हां, हम बात कर रहे हैं अमर सिंह की।


दरअसल, अमर सिंह में चाहे लोगों को जितनी भी खामियां नजर आती हों, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उन्होंने तमाम मौकों पर साबित किया है कि वह दोस्तों के दोस्त हैं। यह अनिल अंबानी से उनकी दोस्ती ही है कि जब पूरा देश न्यूक्लियर डील पर बहस कर रहा था, उन्होंने बहस का रुख विंडफॉल टैक्स की ओर मोड़ दिया और अनिल पर लगातार हमले कर रहे मुकेश अंबानी बचाव की मुद्रा में आ गए। तो यह है दोस्ती! भले ही मुकेश अंबानी की तिजोरी बहुत बड़ी हो और तमाम पॉलिटिकल पार्टियों में उनके खैरख्वाह हों, लेकिन दोस्ती के आगे पैसे की ताकत बौनी हो गई और कोई भी खुलकर मुकेश के समर्थन में नहीं आया।

दोस्ती सबसे ऊपर है

आज की तारीख में यह एक सच्चाई है कि दोस्ती तमाम संबंधों में सबसे ऊपर पहुंच गई है। लोग दोस्तों की खातिर अपने पारिवारिक संबंधों को तिलांजलि देने तक से नहीं हिचक रहे, तो बदले में दोस्ती जिंदगी की राह आसान भी बना रही है। आज के जमाने में, जबकि लोग अपने घरों से हजारों किलोमीटर दूर नौकरी तलाश रहे हैं या बिज़नस कर रहे हैं, तो दोस्ती ही वह रास्ता है, जो तमाम मुश्किलों को आसान कर रहा है।

विश्वसनीयता घटी, दोस्ती बढ़ी

दोस्ती की नींव इन दिनों शायद इसलिए भी गहरी हो रही है, क्योंकि लोगों की विश्वसनीयता लगातार घट रही है। गलाकाट कॉम्पिटीशन के इस दौर में किसी पर सहज ही विश्वास कर लेना लगभग असंभव हो गया है। जब आस्तीन के सांपों की संख्या बढ़ जाए, तो बेहतर यही होता है कि आस्तीन को इतना मजबूत कर लो कि सांप आपको काट न सके। और वास्तव में दोस्त आपकी आस्तीन को मजबूत करने का काम करते हैं। विश्वसनीयता घटने का आलम यह है कि लोग अब न सिर्फ अच्छे दोस्त बनाने के लिए बहुत कुछ त्यागने के लिए तैयार रहते हैं, बल्कि अच्छे दोस्तों को छोटी-मोटी बातों के लिए खोना भी नहीं चाहते।

एक और एक ग्यारह

जब दुनिया आपको कमजोर करने पर तुली हुई हो, तो एक दोस्त ही होता है, जो आपको सहारा देता है। जाहिर है, दो कमजोर आदमी मिलकर एक मजबूत दीवार बनने की ताकत पैदा कर लेता है। अमिताभ बच्चन पहले सबके दोस्त हुआ करते थे, लेकिन एबीसीएल के फ्लॉप होने के बाद वह अमर सिंह, अनिल अंबानी और सुब्रत राय सहारा जैसे चंद बड़े लोगों के ही दोस्त बनकर रह गए। दरअसल, अमिताभ घाटे के जिस दलदल में फंस गए थे, वहां से निकलना उन्हें मुश्किल लग रहा था। सरकार थी कि रोज उन पर लाखों के टैक्स का नोटिस भेज रही थी। ऐसे में अमर सिंह उनके लिए भामाशाह साबित हुए और धीरे-धीरे बिग बी आर्थिक संकट से बाहर निकल गए।

जाहिर है, पहली बार अमिताभ को किसी की जरूरत पड़ी और इसी जरूरत ने उन्हें ऐसे दोस्त बनाने पर विवश किया, जिसने डंके की चोट पर कहा कि अमिताभ उनके गहरे दोस्त हैं। अमिताभ, अनिल, अमर, सुब्रत राय और मुलायम सिंह की दोस्ती की आज मिसाल दी जाती है। यह एक ऐसी दोस्ती है, जिसमें सब सबको खुले दिल से सहारा दे रहा है और अपनी गाड़ी आगे बढ़ा रहा है।

दोस्त हैं, तो गॉडफादर क्यों

वैसे, जिस दोस्ती के बल पर अमिताभ डटे हुए हैं, उसी दोस्ती के बल पर शाहरुख खान उन्हें इंडस्ट्री में टक्कर देने की स्थिति में है। अमिताभ के लार्जर दैन लाइफ पर्सनैलिटी के सामने अगर शाहरुख चुनौती बनकर उभरे हैं, तो बस अपनी दोस्ती के बल पर ही। वास्तव में दोस्ती ने बॉलिवुड में गॉडफादर की जरूरत को खत्म करना शुरू कर दिया है।

शाहरुख जब बॉलिवुड आए थे, इंडस्ट्री में उनका कोई नहीं था। उन्होंने गॉडफादर बनाने की बजाय, दोस्त बनाने पर जोर दिया। करण जौहर, आदित्य चोपड़ा, प्रीति जिंटा, काजोल, जूही चावला, फरहा खान, रानी मुखर्जी जैसे तमाम प्रॉड्यूसर, डाइरेक्टर और ऐक्टर हैं, जिनकी दोस्ती ने शाहरुख को इस लायक बनाया कि वह बिग बी को टक्कर दे सकें। आज आलम यह है कि बॉलिवुड की तमाम अच्छी स्क्रिप्ट शाहरुख के पास जाती हैं और रिजेक्ट होने के बाद ही किसी और को ऑफर होती हैं। आज दोस्तों के भरोसे बाकायदा शाहरुख कैंप कायम हो गया है और अमिताभ को बराबर की टक्कर दे रहा है।

खेल की दुनिया में भी दोस्ती की कहानियां कम नहीं हैं। हालांकि, क्रिकेट में ऐसी तगड़ी प्रतिस्पर्धा है कि दो खिलाडि़यों का दोस्त बनना और दोस्ती को कायम रखना बेहद मुश्किल होता है, लेकिन कुछ ऐसे खिलाड़ी भी हैं, जो काफी अच्छे दोस्त हैं। युवराज और भज्जी काफी अच्छे दोस्त हैं। वे मैदान पर ही नहीं, मैदान के बाहर भी मिलकर खूब मस्ती करते हैं। हाल ही में जब भज्जी और गीता बसरा के बीच अफेयर की चर्चा चली, तो गीता की सफाई थी, 'युवी से भी मैं उतनी ही करीब हूं, जितनी कि हरभजन से। हम तीनों ही पंजाबी हैं, इसलिए हम बेहद करीब हैं।'

खेल में दोस्ती की कितनी अहमियत है, इसे टेनिस स्टार पेस-भूपति से ज्यादा कोई नहीं जान सकता। जब तक वे दोस्त रहे, टेनिस की सारी बाजियां जीतते रहे, यहां तक कि ओलिम्पिक मेडल भी, लेकिन एक बार जैसे ही उनकी ट्यूनिंग बिगड़ी, वे नंबर वन की रैंकिंग से दूर होते चले गए।
2 Aug 2008, 2358 hrs IST,हेलो दिल्ली  

No comments:

Post a Comment