Thursday, January 27, 2011

क्यों मारे जाते हैं सोनावाणे और मंजूनाथ

सोनावाणे की हत्या के मामले को इसी बड़े संदर्भ में देखे जाने की जरूरत है. इसलिए इस पर संतोष नहीं कर लिया जाना चाहिए कि सोनावाणे की हत्या के सभी आरोपी दो दिन के अंदर गिरफ्तार कर लिए गए या इस कांड के फौरन बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तेल माफिया के खिलाफ कार्रवाई का अभियान चलाने की घोषणा कर दी.
यहां यह याद रखने की जरूरत है कि मंजूनाथ की हत्या के बाद उत्तर प्रदेश में किरोसिन के वितरण नेटवर्क की निगरानी सख्त की गई थी लेकिन वह अप्रभावी साबित हुई और आज हम सहज अंदाजा लगा सकते हैं कि वहां सब कुछ जैसे का तैसा चल रहा होगा.
मीडिया के कुछ हिस्सों का यह तर्क भी विचित्र है कि ऐसी घटनाएं तब तक होती रहेंगी, जब तक किरोसिन पर भारी सब्सिडी मिलती रहेगी. क्योंकि किरोसिन जहां बारह रु पए लीटर है, वहीं पेट्रोल साठ और डीजल पैंतीस रुपए लीटर है, जिससे किरोसिन चुरा कर उसे पेट्रोल या डीजल में मिलाना फायदे का धंधा साबित होता है.
दलील यह है कि अगर सब्सिडी खत्म कर किरोसिन को भी महंगा कर दिया जाए, तो उसकी चोरी फायदे का सौदा नहीं रह जाएगी और इस तरह तेल माफिया यह काम छोड़ देंगे. जाहिर है, तब किसी मंजूनाथ या सोनावाणे की जान खतरे में नहीं पड़ेगी. लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर इस तर्क को किस हद तक फैलाया जा सकता है? क्या आरटीआई कार्यकर्ताओं की जान बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही है आरटीआई को खत्म कर दिया जाए? या चोरी रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि लोग अपने घरों में पैसा या कीमती सामान न रखें? दरअसल, यह एक पतित दलील है. या कहें, बेईमान दलील है, जो सोनावाणे की हत्या को मौका बनाकर किसी अन्य उद्देश्य से पेश की जा रही है.
यहां सीधा और साफ मुद्दा यह है कि हमारी शासन व्यवस्था पर भ्रष्ट समूहों की पकड़ है और उनके माध्यम से अपराधी समूहों ने वहां तक पहुंच बना ली है. आज इस पर ध्यान केंद्रित करना सबसे जरूरी है, क्योंकि इस परिघटना के प्रति लोगों को जागरूक बनाकर और उनके सामूहिक दबाव से ही किसी समाधान की उम्मीद की जा सकती है.

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