अपदस्थ दूरसंचार मंत्री ए.राजा अब सलाखों के पीछे हैं। जो हुआ है, वह एक बड़े मामले का एक छोटा-सा हिस्सा है। घोटाले के इस अद्वितीय मामले में अनेक लोगों, कॉर्पोरेट घरानों, राजनीतिक नेताओं, नौकरशाहों के गठजोड़ की मिलीभगत है। इन सबको सामने लाने की महती आवश्यकता है। ऎसे कौन लोग हैं, जिन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए, जिन पर अभियोग चलाना चाहिए। इस सूची में सबसे पहला नाम नीरा राडिया का है, जिनसे सीबीआई कुछ समय पहले पूछताछ कर चुकी है। देर-सबेर वे भी खुद को सीबीआई की हिरासत में पाएंगी।
इसके लिए हमें इतिहास की ओर जाना होगा। सीबीआई के उपमहानिरीक्षक विनीत अग्रवाल ने 16 नवंबर 2009 को डायरेक्टर जनरल ऑफ इन्वेस्टीगेशन, आय कर (डीजीआईटी) मिलाप जैन को पत्र लिखा था। पत्र में नीरा राडिया और अन्य के खिलाफ की गई निगरानी के विवरण देने की बात उल्लिखित थी। सीबीआई ने इसके एक माह पहले यानी 21 अक्टूबर 2009 को भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया था और वर्ष 2007-2008 में यूएएस लाइसेंस के आवंटन में कुछ जन सेवकों और निजी लोगों के बीच आपराधिक षड्यंत्र को लेकर जांच शुरू कर दी थी। ये जनसेवक ए. राजा, चंदोलिया और बेहुरिया के रूप में सामने आए और अब तो यह सूची और लंबी हो रही है।
अग्रवाल द्वारा डीजीआईटी से किए अनुरोध के चार दिन के भीतर ही आय कर विभाग के संयुक्त निदेशक आशीष अबरोल ने अग्रवाल को -अतिनियमनिष्ठ और अतितम गोपनीय- पत्र लिखकर उन जानकारियों को साझा करने का प्रस्ताव किया, जो उन्होंने नीरा राडिया के टेलीफोन टेपों के माध्यम से जुटाई थीं (यह पत्र वेबसाइट पर उपलब्ध करवा दिया गया था)। उस पत्र में अबरोल ने दो महत्वपूर्ण बातें कही थीं और इन्हीं बातों की वजह से नीरा राडिया को वैसी ही स्थितियों से गुजरना होगा, जिनसे ए. राजा गुजर रहे हैं।
पहली बात, टेप की गई बातचीत से पता चलता है कि लाइसेंस आवंटन में अपने लोगों को उपकृत करने में राडिया की भूमिका हो सकती है। बातचीत में वह नए टेलीकॉम ऑपरेटर को निर्देशित करती हैं कि विदेशी निवेशकों के जरिये आ रहे धन के प्रवाह में देरी करने की जरूरत है और सरकार को यह पता नहीं चलना चाहिए कि लाइसेंस आवंटन से कोई अप्रत्याशित लाभ हुआ है। (यह बातचीत अभी तक जनता को उपलब्ध नहीं करवाई गई है)।
दूसरी बात : टेप में राडिया और दूरसंचार मंत्री के बीच सीधी बातचीत के भी कुछ अंश हैं। वार्तालाप में राडिया शेखी बघारती हैं कि उनके प्रयासों से कुछ टेलीकॉम ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम लाइसेंस हासिल करने में मदद मिली है। इसके अलावा राडिया भी चंदोलिया के संपर्क में रही हैं।
इस बीच राजा और उनके दो सहयोगियों के खिलाफ अदालती कार्यवाही के दौरान सीबीआई ने कहा है कि स्वान टेलीकॉम और यूनीटेक को लाइसेंस दिलाने में उसके पास तीन लोगों की भूमिका के सबूत हैं। अब देखना यह है, स्वान टेलीकॉम और यूनीटेक के साथ हुए समझौतेके बारे में रिकॉर्ड की गई बातचीत के जो सारांश डीजीआईटी ने सीबीआई को सौंपे हैं, उनमें क्या है।
यूनीटेक मामले में कहा जाता है कि नीरा राडिया ने यूनीटेक समूह को लाइसेंस दिलाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। राडिया ने यूनीटेक को सलाह दी थी कि वह नार्वे की टेलीनोर कंपनी को 6,000 करोड़ से अधिक के शेयर बेच डाले। जहां तक स्वान टेलीकॉम का सवाल है तो रिकॉर्डेड बातचीत से पता चलता है कि इसके पीछे मुंबई की एक रीयल इस्टेट कंपनी का वरदहस्त है।
सीबीआई और आय कर अधिकारियों के पास मौजूद विवरणों की रोशनी में पता चलता है कि यूनीटेक और स्वान कंपनियों को लाइसेंस दिलाने में राडिया और उनके कुछ सहयोगी मुख्य लोगों में थे। यह बात अलग है कि इन दोनों कंपनियों के पीछे जो लोग हैं, उनके नाम अभी तक मीडिया सामने नहीं ला सका है।
स्वान टेलीकॉम को डायनामिक्स बलवास ग्रुप चला रहा है। यह मुंबई की रीयल इस्टेट कंपनी है। इस ग्रुप के मालिक शाहिद बलवा और विनोद गोयनका है। इन दोनों का नाम फोब्र्स की अरबपतियों की सूची में 49वें और 50वें नंबर पर है। जब उन्हें 1,537 करोड़ रूपए में 13 सर्किलों के लिए लाइसेंस दिया गया था, तब उनके पास टेलीकॉम से सबन्धित कोई अनुभव नहीं था। बलवा और गोयनका की भूमिका पर मीडिया ने अभी तक कोई खुलासा नहीं किया है। यूनीटेक ग्रुप, अन्य रीयल इस्टेट कंपनी है, जिसके संचालक रमेशचंद्र और उनके पुत्र अजय और संजय हैं। राडिया के टेपों के खुलासे से ये लोग भी संकट में फंस गए हैं। कुछ भी हो, 2जी स्पेक्ट्रम मामले में, जिन लोगों के नामों का उल्लेख ऊपर किया गया है, के अलावा अन्य कई लोग भी लिप्त हैं। अब तो उच्चतम न्यायालय जांच की निगरानी कर रहा है, ऎसे में यह उम्मीद जगती है कि अन्य दोषियों के खिलाफ भी मामला दर्ज होगा।
अब यह कहा जा सकता है कि कुंठा, निराशा और उत्सुकता का जो चक्र चल रहा है, उसे हम सभी ने मई 2010 में ही तब महसूस कर लिया था, जब वेबसाइट ने गोपनीय कागजातों को उजागर करने का जोखिम उठाने का निश्चय किया था। अब वो प्रयास फलीभूत हो रहे हैं, लेकिन दबाव के आगे झुकना नहीं चाहिए, क्योंकि जो नाम अभी दबे हुए हैं, वे इतने बड़े हैं कि बच निकल सकते हैं।
गिरीश निकम
वरिष्ठ पत्रकार
इसके लिए हमें इतिहास की ओर जाना होगा। सीबीआई के उपमहानिरीक्षक विनीत अग्रवाल ने 16 नवंबर 2009 को डायरेक्टर जनरल ऑफ इन्वेस्टीगेशन, आय कर (डीजीआईटी) मिलाप जैन को पत्र लिखा था। पत्र में नीरा राडिया और अन्य के खिलाफ की गई निगरानी के विवरण देने की बात उल्लिखित थी। सीबीआई ने इसके एक माह पहले यानी 21 अक्टूबर 2009 को भ्रष्टाचार उन्मूलन अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया था और वर्ष 2007-2008 में यूएएस लाइसेंस के आवंटन में कुछ जन सेवकों और निजी लोगों के बीच आपराधिक षड्यंत्र को लेकर जांच शुरू कर दी थी। ये जनसेवक ए. राजा, चंदोलिया और बेहुरिया के रूप में सामने आए और अब तो यह सूची और लंबी हो रही है।
अग्रवाल द्वारा डीजीआईटी से किए अनुरोध के चार दिन के भीतर ही आय कर विभाग के संयुक्त निदेशक आशीष अबरोल ने अग्रवाल को -अतिनियमनिष्ठ और अतितम गोपनीय- पत्र लिखकर उन जानकारियों को साझा करने का प्रस्ताव किया, जो उन्होंने नीरा राडिया के टेलीफोन टेपों के माध्यम से जुटाई थीं (यह पत्र वेबसाइट पर उपलब्ध करवा दिया गया था)। उस पत्र में अबरोल ने दो महत्वपूर्ण बातें कही थीं और इन्हीं बातों की वजह से नीरा राडिया को वैसी ही स्थितियों से गुजरना होगा, जिनसे ए. राजा गुजर रहे हैं।
पहली बात, टेप की गई बातचीत से पता चलता है कि लाइसेंस आवंटन में अपने लोगों को उपकृत करने में राडिया की भूमिका हो सकती है। बातचीत में वह नए टेलीकॉम ऑपरेटर को निर्देशित करती हैं कि विदेशी निवेशकों के जरिये आ रहे धन के प्रवाह में देरी करने की जरूरत है और सरकार को यह पता नहीं चलना चाहिए कि लाइसेंस आवंटन से कोई अप्रत्याशित लाभ हुआ है। (यह बातचीत अभी तक जनता को उपलब्ध नहीं करवाई गई है)।
दूसरी बात : टेप में राडिया और दूरसंचार मंत्री के बीच सीधी बातचीत के भी कुछ अंश हैं। वार्तालाप में राडिया शेखी बघारती हैं कि उनके प्रयासों से कुछ टेलीकॉम ऑपरेटरों को स्पेक्ट्रम लाइसेंस हासिल करने में मदद मिली है। इसके अलावा राडिया भी चंदोलिया के संपर्क में रही हैं।
इस बीच राजा और उनके दो सहयोगियों के खिलाफ अदालती कार्यवाही के दौरान सीबीआई ने कहा है कि स्वान टेलीकॉम और यूनीटेक को लाइसेंस दिलाने में उसके पास तीन लोगों की भूमिका के सबूत हैं। अब देखना यह है, स्वान टेलीकॉम और यूनीटेक के साथ हुए समझौतेके बारे में रिकॉर्ड की गई बातचीत के जो सारांश डीजीआईटी ने सीबीआई को सौंपे हैं, उनमें क्या है।
यूनीटेक मामले में कहा जाता है कि नीरा राडिया ने यूनीटेक समूह को लाइसेंस दिलाने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। राडिया ने यूनीटेक को सलाह दी थी कि वह नार्वे की टेलीनोर कंपनी को 6,000 करोड़ से अधिक के शेयर बेच डाले। जहां तक स्वान टेलीकॉम का सवाल है तो रिकॉर्डेड बातचीत से पता चलता है कि इसके पीछे मुंबई की एक रीयल इस्टेट कंपनी का वरदहस्त है।
सीबीआई और आय कर अधिकारियों के पास मौजूद विवरणों की रोशनी में पता चलता है कि यूनीटेक और स्वान कंपनियों को लाइसेंस दिलाने में राडिया और उनके कुछ सहयोगी मुख्य लोगों में थे। यह बात अलग है कि इन दोनों कंपनियों के पीछे जो लोग हैं, उनके नाम अभी तक मीडिया सामने नहीं ला सका है।
स्वान टेलीकॉम को डायनामिक्स बलवास ग्रुप चला रहा है। यह मुंबई की रीयल इस्टेट कंपनी है। इस ग्रुप के मालिक शाहिद बलवा और विनोद गोयनका है। इन दोनों का नाम फोब्र्स की अरबपतियों की सूची में 49वें और 50वें नंबर पर है। जब उन्हें 1,537 करोड़ रूपए में 13 सर्किलों के लिए लाइसेंस दिया गया था, तब उनके पास टेलीकॉम से सबन्धित कोई अनुभव नहीं था। बलवा और गोयनका की भूमिका पर मीडिया ने अभी तक कोई खुलासा नहीं किया है। यूनीटेक ग्रुप, अन्य रीयल इस्टेट कंपनी है, जिसके संचालक रमेशचंद्र और उनके पुत्र अजय और संजय हैं। राडिया के टेपों के खुलासे से ये लोग भी संकट में फंस गए हैं। कुछ भी हो, 2जी स्पेक्ट्रम मामले में, जिन लोगों के नामों का उल्लेख ऊपर किया गया है, के अलावा अन्य कई लोग भी लिप्त हैं। अब तो उच्चतम न्यायालय जांच की निगरानी कर रहा है, ऎसे में यह उम्मीद जगती है कि अन्य दोषियों के खिलाफ भी मामला दर्ज होगा।
अब यह कहा जा सकता है कि कुंठा, निराशा और उत्सुकता का जो चक्र चल रहा है, उसे हम सभी ने मई 2010 में ही तब महसूस कर लिया था, जब वेबसाइट ने गोपनीय कागजातों को उजागर करने का जोखिम उठाने का निश्चय किया था। अब वो प्रयास फलीभूत हो रहे हैं, लेकिन दबाव के आगे झुकना नहीं चाहिए, क्योंकि जो नाम अभी दबे हुए हैं, वे इतने बड़े हैं कि बच निकल सकते हैं।
गिरीश निकम
वरिष्ठ पत्रकार
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