Thursday, February 17, 2011

अटैची में पैसे नहीं लेते हैं सट्टेबाज, बैंक खाते खुलवाकर पैसे जमा करवाते हैं रकम

नई दिल्ली. भारत में सट्टेबाजी ने 1983 में भारत के क्रिकेट विश्व कप जीतने के साथ जोर पकड़ा। क्रिकेट की लगातार बढ़ती लोकप्रियता के चलते मैचों के टीवी पर सीधे प्रसारण होने लगे और इसके साथ मैच फिक्सिंग और सट्टेबाजी का खेल भी अपने शबाब पर आने लगा। इस बार हो रहे विश्व कप क्रिकेट में 14 टीमें खेल रही हैं, जिसका सीधा मतलब है कि ज़्यादा मैच और उनपर सट्टा लगाने के ज़्यादा मौके। सट्टेबाज किस तरह से करोडो़ं-अरबों का धंधा चलाते हैं, यह ज़्यादातर लोगों के लिए एक रहस्य रहता है।

एक मशहूर पत्रिका ने हाल ही में एक पूर्व सट्टेबाज से बातचीत के जरिए यह जानने की कोशिश की थी कि सट्टेबाज किस तरह से पैसे का लेनदेन करते हैं और उनके कारोबार के तौर तरीके क्या हैं। पत्रिका के मुताबिक क्रिकेट सट्टेबाजी में पैसे लगाने वाले मुंबई के कारोबारी ने कहा, 'ऐसे धंधे (सट्टेबाजी) में कोई काग़ज़ी कार्रवाई नहीं होती है। लोग भरोसे के आधार पर धंधा करते हैं। इसी भरोसे के आधार पर पूरा सिस्टम काम करता है। मेरे लेनदेन में कभी कोई गड़बड़ी नहीं होती है।' सट्टेबाज लेन-देन के तौरतरीकों को बदलते रहते हैं। यही वजह है कि जांच एजेंसियों के लिए सट्टेबाजों को पकड़ना और मुश्किल हो जाता है।

पहले सट्टेबाज कर चुके और अब पुलिस के मुखबिर गुलजार उर्फ दानिश पटेल के मुताकि, 'सट्टेबाज अब अटैची में नोट भरकर न तो लेते हैं और न ही देते हैं। अब पैसे लगाने वालों से कहा जाता है कि वह किसी खास बैंक अकाउंट में पैसे जमा करें। इसके बाद सटोरिया उस पैसे को बैंक से निकालता है। अकाउंट किसी सटोरिए के नाम नहीं होता है।' गुलजार का कहना है, 'सट्टेबाज किसी भी ऐसे शख्स के जरिए बैंक में अकाउंट खुलवाते हैं, जिसे पैसे की जरूरत है। सट्टेबाज ऐसे शख्स को अपने नाम पर खाता खुलवाने के लिए करीब 10,000 रुपये देते हैं। जब पैसे लगाने वाला इस अकाउंट में पैसे डाल देता है तो सट्टेबाज सारी रकम निकालकर खाता बंद करवा देते हैं। गुलजार के मुताबिक देश भर के नामी बैंकों में ऐसे 13 लाख खाते हैं,

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