हैदराबाद. यूपीए सरकार को विभिन्न मामलों में न्यायपालिकाओं की प्रतिकूल टिप्पणियां चुभने लगी हैं। न्यायपालिका की इसी अतिसक्रियता वाले रुख से हैरान-परेशान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी बात कहने के लिए हैदराबाद में रविवार को 17वें राष्ट्रमंडल विधि सम्मेलन का मंच चुना। उन्होंने न्यायिक सक्रियता के लिए भी एक लक्ष्मण रेखा खींचने को कहा। उन्होंने कहा,न्यायिक समीक्षा के अधिकार का इस्तेमाल जवाबदेही तय करने के लिए होना चाहिए, न कि सरकार के विभागों की भूमिकाओं को कमजोर करने के लिए।
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते विश्व में कानूनी व्यवस्था को भी खुद को बदलना होगा। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘यह केवल एक मात्र रास्ता है जिसके जरिए कानूनी व्यवस्था अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकती है। सामाजिक स्थायित्व और प्रगतिशील परिवर्तन के लिए कानून को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने पर अदालतों और न्यायाधीश की भूमिका पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए।’ वैसे यह कोई नई बात नहीं है कि न्यायपालिका और सरकार अनेक मसलों पर आमने-सामने हों।पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी भी खुल कर न्यायपालिका के सरकार पर हावी होने पर आपत्ति जता चुके हैं। कुछ समय पहले तो 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में कोर्ट ने प्रधानमंत्री सिंह को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था। सीवीसी प्रमुख पीजी थामस की नियुक्ति के मसले पर भी सरकार को कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां सुनने को मिली हैं। बल्कि प्रधानमंत्री के लिए यह भी परेशानी का सबब बन गया है कि जज अब अदालत के भीतर नहीं बल्कि बाहर भी प्रतिकूल टिप्पणी करने लगे हैं। जैसा कि ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख के मसले पर अदालत के बाहर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की तल्ख टिप्पणियां आई हैं। अपनी टिप्पणी में न्यायाधीश ने एक तरह से प्रधानमंत्री पर ही सवाल उठा दिया है कि वह आखिर देशमुख को कैसे मंत्री बने रहने देते हैं।देशमुख जैसों को मंत्री बनाना बेशर्मी : सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणी
उधर, मुंबई में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और फिलहाल केंद्र में मंत्री विलासराव देशमुख को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने विपरीत टिप्पणी की। शीर्ष अदालत के मुताबिक, ‘ऐसे लोगों को मंत्री बनाना कोई गौरवशाली नहीं, बल्कि बेशर्मी भरा काम है।’ मुंबई में एक सेमिनार के दौरान शनिवार को शीर्ष अदालत के जस्टिस एके गांगुली और जस्टिस जीएस सिंघवी ने कहा, ‘यह बहुत दुखद और शर्मनाक है। आखिर कैसे सरकार ऐसे लोगों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे देती है।’ देशमुख इस वक्त ग्रामीण विकास मंत्रालय देख रहे हैं। जजों ने देशमुख की इस बात के लिए निंदा की कि उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर एक विधायक की अनुचित तरफदारी की। जस्टिस गांगुली ने रविवार को फिर कहा, ‘मैं जो चाहता था, कह दिया। उसका मैं खंडन नहीं कर रहा हूं।’
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति पर :
‘थॉमस की नियुक्ति में गड़बडिय़ां इसलिए हुईं क्योंकि चयन समिति ने कुछ खास तथ्यों जैसे पामोलिन आयात घोटाले में दायर चार्जशीट की अनदेखी की।’
राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार पर:
‘जब किसी काम में (कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी में) 70 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हों, तब इस बात से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।’
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा कि तेजी से बदलते विश्व में कानूनी व्यवस्था को भी खुद को बदलना होगा। प्रधानमंत्री ने कहा, ‘यह केवल एक मात्र रास्ता है जिसके जरिए कानूनी व्यवस्था अपनी प्रासंगिकता बनाए रख सकती है। सामाजिक स्थायित्व और प्रगतिशील परिवर्तन के लिए कानून को एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल करने पर अदालतों और न्यायाधीश की भूमिका पर ज्यादा जोर नहीं देना चाहिए।’ वैसे यह कोई नई बात नहीं है कि न्यायपालिका और सरकार अनेक मसलों पर आमने-सामने हों।पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी भी खुल कर न्यायपालिका के सरकार पर हावी होने पर आपत्ति जता चुके हैं। कुछ समय पहले तो 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में कोर्ट ने प्रधानमंत्री सिंह को ही कठघरे में खड़ा कर दिया था। सीवीसी प्रमुख पीजी थामस की नियुक्ति के मसले पर भी सरकार को कोर्ट की तल्ख टिप्पणियां सुनने को मिली हैं। बल्कि प्रधानमंत्री के लिए यह भी परेशानी का सबब बन गया है कि जज अब अदालत के भीतर नहीं बल्कि बाहर भी प्रतिकूल टिप्पणी करने लगे हैं। जैसा कि ग्रामीण विकास मंत्री विलासराव देशमुख के मसले पर अदालत के बाहर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की तल्ख टिप्पणियां आई हैं। अपनी टिप्पणी में न्यायाधीश ने एक तरह से प्रधानमंत्री पर ही सवाल उठा दिया है कि वह आखिर देशमुख को कैसे मंत्री बने रहने देते हैं।देशमुख जैसों को मंत्री बनाना बेशर्मी : सुप्रीम कोर्ट के जजों की टिप्पणी
उधर, मुंबई में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और फिलहाल केंद्र में मंत्री विलासराव देशमुख को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों ने विपरीत टिप्पणी की। शीर्ष अदालत के मुताबिक, ‘ऐसे लोगों को मंत्री बनाना कोई गौरवशाली नहीं, बल्कि बेशर्मी भरा काम है।’ मुंबई में एक सेमिनार के दौरान शनिवार को शीर्ष अदालत के जस्टिस एके गांगुली और जस्टिस जीएस सिंघवी ने कहा, ‘यह बहुत दुखद और शर्मनाक है। आखिर कैसे सरकार ऐसे लोगों को कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे देती है।’ देशमुख इस वक्त ग्रामीण विकास मंत्रालय देख रहे हैं। जजों ने देशमुख की इस बात के लिए निंदा की कि उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर एक विधायक की अनुचित तरफदारी की। जस्टिस गांगुली ने रविवार को फिर कहा, ‘मैं जो चाहता था, कह दिया। उसका मैं खंडन नहीं कर रहा हूं।’
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
सीवीसी पीजे थॉमस की नियुक्ति पर :
‘थॉमस की नियुक्ति में गड़बडिय़ां इसलिए हुईं क्योंकि चयन समिति ने कुछ खास तथ्यों जैसे पामोलिन आयात घोटाले में दायर चार्जशीट की अनदेखी की।’
राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार पर:
‘जब किसी काम में (कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी में) 70 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हों, तब इस बात से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं।’
देशमुख ने डाला सरकार को मुश्किल में नवभारत टाइम्स
सुप्रीम कोर्ट के जज ने देशमुख पर उठाए सवाल हिन्दुस्तान दैनिक
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