स्नानघर तथा शौचालय किसी भी वास्तु योजना का एक महत्वपूर्ण भाग होता है और यदि इन्हें नहीं साधा जाए तो अच्छी से अच्छी वास्तु योजना की सफलता का प्रतिशत तथा शुभत्व घटा देता है। महानगरीय संस्कृति, जगह की कमी, शास्त्रीय ज्ञान की कमी, फ्लैट सिस्टम तथा हाउसिंग सोसाइटीज द्वारा बनाए गए मकान इत्यादि कुछ प्रमुख कारण हैं जो किसी भी घर में स्नानघर तथा शौचालय को उचित स्थान पर नहीं बनने देते तथा वास्तु सम्मत निर्माण में विकार उत्पन्न कर देते हैं। इसके अतिरिक्त स्नानघर तथा शौचालय को एक ही साथ बनाने की इच्छा भी वास्तु योजना में दोष उत्पन्न कर देती है। स्नानागार तथा शौचालय को हल्के रूप में नहीं लेना चाहिए क्योंकि किसी अच्छे से अच्छे भूखण्ड, एक बढि़या से बढि़या द्वार योजना और उन्नत निर्माण के बावजूद भी स्नानागार और शौचालय यदि गलत जगह पर बना दिए गए तो शुभत्व में कमी लाते हैं।
1. शौचालय : शौचालय के लिए श्रेष्ठ स्थान है नैऋत्य कोण तथा दक्षिण दिशा के मध्य का स्थान। यहीं पर बना शौचालय शुभ होता है और वास्तु सम्मत निर्माण को पूर्ण करने तथा विकार न उत्पन्न होने की संभावना को जन्म देता है, यथा सम्भव यहां पर स्नानागार नहीं बनाएं।
चारों मुख्य दिशाओं उत्तर, पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण मध्य में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए। चारों प्रमुख कोणों नैऋत्य, ईशान, वायव्य तथा अगिAकोण में तथा ब्रrा स्थान में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए।
नैऋत्य कोण तथा दक्षिण मध्य दिशा के बीच में बनाने के अतिरिक्त भी निम्न स्थानों पर काम चलाऊ शौचालय बनाए जा सकते हैं।
1. नैऋत्य तथा पश्चिम के मध्य,
2. पश्चिम मध्य तथा वायव्य के मध्य
3. ईशान तथा पूर्व दिशा मध्य के बीच
4. पूर्व दिशा मध्य तथा अग्निकोण के मध्य उत्तर दिशा में कहीं भी शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए। उत्तर दिशा में शौचालय न केवल अच्छे द्वार की संभावना को समाप्त कर देता है अपितु जलाशय एवं औषधि हेतु प्रशस्त स्थानों को भी दूषित कर सकता है, इसके अतिरिक्त उत्तर में शौचालय नहीं बनाने से इसे हल्का रखने में भी सहायता मिलती है।
2. स्नानागार : प्राचीन शास्त्रों में स्नान घर के लिए केवल एक ही स्थान प्रशस्त बताया गया है, वह है पूर्व मध्य दिशा। स्नान घर कभी भी अग्निकोण तथा ब्रrा स्थान में प्रशस्त नहीं है।
आजकल सुविधा की दृष्टि से स्नानघर को शौचालय से जो़डकर बनाया जाता है। जहां तक हो सके ऎसी स्थिति में पानी का ढलान पूर्व व उत्तर दिशा की तरफ ही रखा जाना चाहिए। सीवरेज लाइन की सुविधा शहर में हो तो पानी या शौचालय के लिए वर्जित स्थानों में गढ्ढा नहीं करना चाहिये। शौचालय व स्नानघर के अवशिष्ट पानी के निकास के लिए कई बार मकान में गढ्ढा बना देने से अवांछित दोष उत्पन्न हो जाते हैं। यह गढ्ढा अगर 5-6 फुट से अधिक हो तो नुकसान दे सकता है। यदि पानी के मकान से बाहर निकास की उचित व्यवस्था हो जाए व इस तरह के अवशिष्ट को भूखंड में प्रवेश से रोक दिया जाए तो दोष को कम किया जा सकता है।
लेखक ज्योतिष मंथन के प्रधान संपादक है
सतीश शर्मा 0 comments
1. शौचालय : शौचालय के लिए श्रेष्ठ स्थान है नैऋत्य कोण तथा दक्षिण दिशा के मध्य का स्थान। यहीं पर बना शौचालय शुभ होता है और वास्तु सम्मत निर्माण को पूर्ण करने तथा विकार न उत्पन्न होने की संभावना को जन्म देता है, यथा सम्भव यहां पर स्नानागार नहीं बनाएं।
चारों मुख्य दिशाओं उत्तर, पूर्व, पश्चिम तथा दक्षिण मध्य में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए। चारों प्रमुख कोणों नैऋत्य, ईशान, वायव्य तथा अगिAकोण में तथा ब्रrा स्थान में शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए।
1. नैऋत्य तथा पश्चिम के मध्य,
2. पश्चिम मध्य तथा वायव्य के मध्य
3. ईशान तथा पूर्व दिशा मध्य के बीच
4. पूर्व दिशा मध्य तथा अग्निकोण के मध्य उत्तर दिशा में कहीं भी शौचालय नहीं बनाया जाना चाहिए। उत्तर दिशा में शौचालय न केवल अच्छे द्वार की संभावना को समाप्त कर देता है अपितु जलाशय एवं औषधि हेतु प्रशस्त स्थानों को भी दूषित कर सकता है, इसके अतिरिक्त उत्तर में शौचालय नहीं बनाने से इसे हल्का रखने में भी सहायता मिलती है।
2. स्नानागार : प्राचीन शास्त्रों में स्नान घर के लिए केवल एक ही स्थान प्रशस्त बताया गया है, वह है पूर्व मध्य दिशा। स्नान घर कभी भी अग्निकोण तथा ब्रrा स्थान में प्रशस्त नहीं है।
लेखक ज्योतिष मंथन के प्रधान संपादक है
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मैंने बहुत सारे लिंक के माध्यम से बाथरूम के लिए वास्तु टिप्स पढ़ा परंतु मुझे यह स्ष्प्स्ट नाई हो पा रहा है कि शौचालय मे बैठते समय मुख किस डिश मे हो .... कृपया मार्गदर्शन करे॥
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