Tuesday, February 8, 2011

अरब जहान में आएगा बदलाव

अर
मिस्र में होस्नी मुबारक के उत्तराधिकारी को ऐसी नीतियां अख्तियार करनी होंगी जिससे हालात दुरुस्त हो सकें और मिस्र अपना खोया रुतबा वापस पा सके।
तकरीबन  तीन दशक पहले गुस्सैल युवाओं ने पश्चिम एशिया में बड़ा तख्तापलट करते हुए हालात एकदम बदल दिए थे। उन्होंने ईरान के शाह को गद्दी से बेदखल कर दिया, मक्का में इस्लाम की पवित्र भूमि को अपने कब्जे में ले लिया और अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ जिहाद में खुद को झोंक दिया। वर्ष 1979 की घटनाओं की दुनिया को बड़ी भारी कीमत चुकानी पड़ी। हालांकि इसमें भ्रामक तौर पर ही लड़ाई लड़ी गई लेकिन इसने इस्लामी चरमपंथ, आतंकवाद जैसे जहर उगले। इन विषैले तत्वों की वजह से पश्चिमी और मुस्लिम देशों के बीच मतभेद की दरार और चौड़ी होती गई।
आज मिस्र की सड़कों पर जो कुछ हो रहा है वह आने वाले दिनों में एक बार फिर दुनिया की तस्वीर बदल सकता है। यही अरब और बाकी दुनिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। यह एक ऐसा इम्तिहान है जिसमें आखिर में नतीजा या तो शासकों या फिर अवाम के हक में निकलेगा। दांव पर केवल इस क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही स्थिरता ही नहीं है बल्कि काफी कुछ और भी है। इस क्षेत्र की अहमियत केवल इसी तथ्य से नहीं लगाई जा सकती कि यह दुनिया की तेल की बड़ी जरूरत पूरा करता है बल्कि यह दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है जो अब क्रांति के मुहाने पर खड़ी है। हमें इसे किस तरह देखना चाहिए?
मिस्र की समस्याएं भी काफी मिश्रित हैं। मसलन लगातार बढ़ती बेरोजगारी, लंबे अर्से से सत्ता पर काबिज निष्क्रिय सत्तातंत्र और भारी तादाद में युवाओं की संख्या जिन्हें काम की तलाश है लेकिन उनके लिए कोई काम नहीं है। किसी भी क्रांति के लिए ये बुनियादी कारक होते हैं और हमने देखा है कि दुनिया के कई देशों में इन कारणों की वजह से क्रांति हो चुकी है। मुबारक इस्तीफा देने में जितनी देरी कर रहे हैं उससे मामला और बिगड़ता नजर आ रहा है क्योंकि उनके खिलाफ विरोध का झंडा बुलंद करने वाले और उनके समर्थक काहिरा की सड़कों पर एक दूसरे का लहू बहा रहे हैं। खून ही खून को जन्म देता है और सड़कों पर छलकता युवाओं का रक्त केवल दूसरों का ही भला कर रहा है।
अपने पद से त्यागपत्र में देरी कर मिस्र के राष्टï्रपति न केवल अपनी जनता का बल्कि खुद का भी उतना ही अहित कर रहे हैं। असल में उन्होंने इतने वर्षों तक ताकत का इस्तेमाल कर अपने देश की जनता को बंधक बनाकर रखने की गलती की है। इस क्षेत्र में कुछ तेल संपन्न खाड़ी देशों को छोड़ दें जहां आबादी का काफी बड़ा तबका संपन्न है, तो हालात एकदम जुदा हैं। ज्यादातर देशों में युवा लंबे समय से राज कर रही दमघोंटू सरकारों, निरंतर बढ़ते भ्रष्टïाचार और अवसरों की कमी से बेहद खराब महसूस कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि दुनिया के बाकी देश इंटरनेट के दौर में आगे बढ़ रहे हैं। वे देख रहे हैं कि कैसे शिक्षा और तकनीक पूर्व और पश्चिम में रहने वाले उनके जैसे लोगों का जीवन स्तर सुधार रही हैं। इस दौरान अरब युवा इसी उम्मीद के साथ जीते रहे कि उन्हें भी एक अदद नौकरी मिलेगी जिससे वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकेंगे और एक इज्जतदार और सभ्य समाज का हिस्सा बन सकेंगे जहां उन्हें भी अपने विचार रखने की आजादी
मिल सकेगी।
आंकड़ों के मुताबिक मिस्र की करीब 8.1 करोड़ की आबादी में 2.5 करोड़ लोग 29 साल से कम उम्र के हैं जबकि देश में युवा बेरोजगारी लगभग 22 से 25 फीसदी के बीच है। ये लोग कुंठित हो चुके हैं और किसी भी तरह से काम चाहते हैं लेकिन अवसरों की कमी के कारण इनकी यह मुराद पूरी नहीं हो पा रही है। आने वाले वर्षों में इस आंकड़ों में और इजाफा ही होगा। मदद मुहैया कराने वाले परंपरागत सरकारी संस्थान भी भौगोलिक बदलाव के कारण मुश्किल दबाव से गुजर रहे हैं। कई मामलों में तो युवाओं को नौकरियों के लिए तीन-तीन साल तक का इंतजार करना पड़ता है। सामाजिक ढांचा भी खतरे में है। कुछ वक्त पहले मेरे सहकर्मी रहे मिस्र के एक 30 वर्षीय युवक ने एक बार मुझसे कहा था कि वह शादी करने के लिए बेकरार है और अपने लिए पत्नी तलाशना चाहता है। उसे यह बखूबी मालूम था कि वह एक आदमी का भी खर्चा उठाने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन असल में वह अपने परिवार की ओर कदम बढ़ाना चाहता था।
इस क्षेत्र में लंबे समय से काबिज सरकारें, जिनमें से कई को अमेरिका का वरदहस्त भी हासिल था, आमजन की आकांक्षाओं को पूरा करने में नाकाम रही हैं। सरकारों की सुस्ती या निष्क्रियता भरे रवैये की वजह से ही अब संकट जैसे हालात बन गए हैं। काहिरा की सड़कों पर जो हो रहा है उससे इस क्षेत्र की सरकारों को कड़ी सीख लेनी चाहिए। इसमें इजरायल भी शामिल है जो फिलस्तीन से सार्थक बातचीत न करने के बहाने ढूंढता रहता है। गतिरोध चाहे राजनीतिक हों या आर्थिक हमेशा कारगर साबित नहीं होते। सुधारों की ही दरकार होती है क्योंकि परिवर्तन ही शाश्वत सत्य है। काहिरा या कहीं और भी जो घटित हो रहा है उसमें मिस्री राष्टï्रवाद की भी भूमिका है। मिस्र के गमाल अब्दल नसीर और उसके बाद अनवर सादात जैसे नेताओं ने दशकों तक पूरी अरब बिरादरी का नेतृत्व किया। यह वह दौर था जब मिस्र अपने औपनिवेशिक अतीत को भुलाकर अपने देशवासियों के लिए एक बेहतर भविष्य बुनना चाहता था।
30 साल पहले काहिरा के एक स्टेडियम में सैनिकों द्वारा सादात की हत्या करने के बाद जबसे मुबारक ने मिस्र की कमान संभाली है, हालात एकदम बदलते गए। इस क्षेत्र में इस्लामी चरमपंथियों के हैरतअंगेज कारनामों के दो साल बाद ही मुबारक ने वास्तविक रूप से सत्ता संभाली। उन्होंने विरोधियों पर लगाम लगाने और साथियों को खुश रखने का आश्वासन दिया। सादात ने इजरायल के साथ जो शांति समझौता किया था उसके हिसाब से मिस्र के अमेरिका के साथ बेहद मजबूत रिश्ते बने। इस
इलाके में कुछ स्थायित्व और शांति आई जो पूर्व में कई भीषण युद्घों की रणभूमि बना हुआ था।
यह तय है कि मुबारक जाएंगे और जब भी उनका दौर खत्म होगा तब उसके बाद का घटनाक्रम और भी चौंकाने वाला हो सकता है। इसके बाद के बदलाव इस क्षेत्र और दुनिया को उसी तरह हिला सकते हैं जैसे अब से तीस साल पहले हुआ था। मुबारक के उत्तराधिकारी के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो देश में स्थायित्व लाने की होगी और साथ ही उन्हें अरब के नेता होने के मिस्र के रुतबे को भी वापस हासिल करना होगा जो मुबारक के दौर में छिन गया। यह भी अरब दुनिया में एक
बदलाव लाएगा।
(लेखक खलीज टाइम्स, दुबई के पूर्व संपादक हैं।)
ब जहान में आएगा बदलाव

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