रोटी पर रॉयल्टी खाना चाहती हैं कंपनियां
By 14/12/2010 17:49:00
2 अक्टूबर को साबरमती से किसान स्वराज यात्रा की शुरूआत करनेवाले दल की प्रमुख और किसानों के लिए काम करनेवाली कविता कुरुगंटी कहीं से किसान नेता नहीं है, लेकिन वे भी महसूस करती हैं कि देश में किसानों के लिए आज राष्ट्रीय स्तर पर कोई नेता नहीं है जो किसानों के हित की बात मुख्यधारा की राजनीति में कर सके. 2 अक्टूबर 2010 से 11 दिसंबर 2010 के बीच सम्पन्न यह यात्रा देश के बीस राज्यों के 100 से अधिक जिलों में होकर गुजरी. पूरी यात्रा के दौरान कविता कुरुगंटी ने क्या अनुभव किया, उनसे बातचीत के जरिए हमने जानने की कोशिश की.
सवाल- यात्रा करने का क्या मकसद था? जवाब- जिस देश में पिछले दस हजार सालों से खेती हो रही हो उस देश में पिछले दस सालों में लाखों किसानों ने आत्महत्या की जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि देश में किसानों के साथ सबकुछ अच्छा नहीं हो रहा है. इस यात्रा के जरिए हम चाहते थे कि देश का ध्यान किसानों की समस्याओं की ओर जाए और प्रत्यक्ष तौर हम नागरिकों से संवाद कर सकें. आज इस बात की सख्त जरूरत है कि न केवल हमारा खाना बल्कि किसान और किसानों की आजादी की भी रक्षा होनी चाहिए. अगर किसानों की आजादी छिनती है तो देश बहुत समय तक आजाद नहीं रह पायेगा.
सवाल- आपको लगता है, अपनी यात्रा में आप अपने लक्ष्य को पाने में कामयाब रहीं?
जवाब- पूरी यात्रा के दौरान हमने यह महसूस किया कि सामान्य नागरिकों में भी किसानों की आत्महत्या को लेकर चिंता है. पूरी यात्रा में हमने यह अनुभव किया कि अगर विदर्भ का किसान अपना दुखड़ा बताता था तो बाकी क्षेत्र के किसान बहुत ध्यान से सुनते थे. यानी किसानों का दुख साझा है. पूरी यात्रा में हमने अनुभव किया कि पूरा देश अपराध बोध में जी रहा है. इस यात्रा में हमने एक बात और अनुभव किया कि विभिन्न आंदोलन समूह किसानों के सवाल पर एक मंच पर आने के लिए तैयार हैं.
सवाल- किसान एक ऐसा मुद्दा है जिस पर एक बार फिर देश में आंदोलन खड़ा किया जा सकता है?
जवाब- इसे इतने सपाट तरीके से नहीं कहा जा सकता. लेकिन इतना निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि किसानों का दुख सबके लिए साझी चिंता का विषय है. सभी राजनीतिक दलों और आंदोलन समूहों में एक संवेदनशीलता तो दिखाई दे रही है और उन्हें लगता है कि वे किसानों के हितों की रक्षा नहीं कर पा रहे हैं जबकि वे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.
"हमें डर है कि देश में किसान आत्महत्याओं का अगला दौर मध्य प्रदेश के मालवा में शुरू हो सकता है. वहां किसान पूरी तरह से कंपनियों के कब्जे में जा चुके हैं."
सवाल- किसानों की दशा और दिशा क्या है?
जवाब- इस देश में हरित क्रांति का क्या नतीजा होनेवाला है इस पर सबसे पहले क्लाड अल्वारिस ने अस्सी के दशक के शुरूआत में कह दिया था कि इसके नतीजे बहुत घातक होंगे. द ग्रेट जीन रॉबरी में उन्होंने लिखा था कि भविष्य में ऐसी विषम परिस्थितियां पैदा होंगी. लेकिन अपनी इस यात्रा में हमने प्रत्यक्ष तौर पर अनुभव किया है कि किसानों की दशा दयनीय है और उनके सामने कोई निश्चित दिशा भी नहीं है. हम जहां भी गये हमने देखा कि जमीन की कीमत भले ही बढ़ गयी हो लेकिन मिट्टी का उपजाऊपन खत्म हो रहा है. बीज पर हमारा अधिकार खत्म हो रहा है. खेती में लागत बहुत बढ़ गयी है और इतना पैसा खर्च करके भी वह जहरीला अन्न पैदा करने के लिए मजबूर है. किसानों की लागत के हिसाब से उनको खेती से लाभ प्राप्त नहीं हो रहा है. अब ऐसे में किसानों के सामने रास्ता तो यह होना चाहिए कि उनका खर्च कम हो ताकि उनकी लागत कम हो ताकि वे खेती में बचत कर सकें. लेकिन उलटे हम खेती को घाटे का सौदा साबित करने में लगे हुए हैं. हकीकत यह है कि पूरी यात्रा के दौरान हमने अनुभव किया कि किसान खेती छोड़ना नहीं चाहता लेकिन उसके सामने ऐसी परिस्थितियां पैदा की जा रही हैं ताकि वह खेती से बाहर चला जाए.
सवाल- यात्रा में आपको ऐसा क्या दिखा जिसकी आपने उम्मीद नहीं की हो?
उत्तर- बहुत से ऐसे दृश्य दिखाई दिये जो चौंकानेवाले थे. झाबुआ में केमिकल फर्टिलाइजर का उपयोग देखकर हम दंग रह गये. मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर केमिकल फर्टिलाइजर और कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है कि हमारे साथ चल रहे पंजाब के किसानों ने भी आश्चर्य व्यक्त किया कि इतनी बड़ी मात्रा में तो वे भी केमिकल फर्टिलाइजर का उपयोग नहीं करते हैं. हमे डर कि मालवा में किसान आत्महत्याओं का अगला दौर शुरू हो सकता है.
इस यात्रा का खर्च लोगों के दान से पूरा किया गया. एक बहुत चौंकानेवाली घटना सामने आयी. हम कोरापुट में थे. वहां भी लोगों ने हमें आर्थिक मदद की. एक आदिवासी महिला जिसके पास पहनने के ढंग के कपड़े भी नहीं थे. आप देख सकते थे कि वह बहुत गरीब है फिर भी उसने किसानों के हित के लिए बिना संकोच के अपने पास से सौ रुपये लाकर दिये. उसकी दशा देखकर हमने उनसे पैसे लेने से मना कर दिया लेकिन उन्होंने कहा कि आप किसानों के लिए काम कर रहे हैं इसलिए इसे आप रख लीजिए. हमें अनुभव हुआ कि देश का आम आदमी आम आदमी के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील हैं. हम सभी के लिए वह आदिवासी महिला बहुत बड़ी प्रेरणास्रोत साबित हुई.
सवाल- खेती किसानी के लिए संकट कौन बन रहा है?
जवाब- कंपनियां खेती के लिए सबसे बड़ा संकट है. हमारी पूरी यात्रा में खेती विरासत मिशन के संस्थापक उमेन्द्र दत्त ने बार बार यह बात कही कि दुनिया में सबसे रईस व्यक्ति बिल गेट्स हैं. उनकी कमाई का सबसे बड़ा जरिया उनके साफ्टवेयर से होनेवाली कमाई है. दुनिया में कितने लोग हैं जो कम्प्यूटर का इस्तेमाल करते हैं? अगर इतने सीमित उपयोग की रॉयल्टी से बिल गेट्स दुनिया के सबसे अमीर आदमी हो सकते हैं तो फिर रोटी पर रॉयल्टी की कमाई से कल्पना करिए कि कंपनियां कितनी अमीर हो जाएंगी? दुनिया की कुछ मुट्ठीभर कंपनियां इसी दिशा में काम कर रही हैं. वे रोटी पर रॉयल्टी खाना चाहती हैं. इसके लिए वे दुनियाभर की सरकारों को अपनी मुट्टी में करके अपने मन मुताबिक नीतियां बना रही हैं. भारत में यह स्थिति बहुत चिंताजनक है. हमारा दुर्भाग्य है कि हमारी सरकारें अपने नागरिकों के हितों की बजाय कंपनियों के हितों की चिंता ज्यादा कर रही हैं. हां, एक बात जरूर है कि अभी भी राज्य सरकारों में अपने नागरिकों को लेकर इतनी अधिक उदासीनता नहीं है. बीटी बैंगन के सवाल पर राज्य सरकारों के रुख के सामने ही केन्द्र सरकार को झुकना पड़ा था और बीटी बैंगन को अनुमति देने से पीछे हटना पड़ा था. फिर भी दिल्ली की सरकार और दिल्ली का मीडिया दोनों का रुख बहुत निराशाजनक है.
सवाल- आपकी यात्रा को मीडिया ने क्या कवरेज दिया?
जवाब- यात्रा के दौरान हम जहां भी गये स्थानीय मीडिया ने यात्रा को विस्तृत कवरेज दिया. हम जिन मुद्दों को उठा रहे थे मीडिया ने उन्हें महत्व दिया और कई स्थानों पर तो किसानों के मुद्दे को संपादकीय पृष्ठों पर छापा गया. लेकिन दिल्ली आकर हम जरूर निराश हुए. भले ही दिल्ली की मीडिया को हम नेशनल मीडिया कहते हों लेकिन हमें दुख के साथ कहना होगा कि दिल्ली का मीडिया देश से पूरी तरह से कटा हुआ है.
No comments:
Post a Comment