प्राइस बैंड अमूमन आईपीओ पर चर्चा के दौरान प्राइस बैंड का भी जिक्र आता है। आईपीओ के दौरान जारी प्रोस्पेक्टस में शेयर के मूल्य का जिक्र होता है या फिर इसकी कीमतों की एक रेंज दी जाती है, जिसके अंदर निवेशक शेयर खरीदने के लिए बोली लगा (आवेदन) कर सकता है। प्राइस बैंड की आखिरी सीमा शेयर के फ्लोर प्राइस के 120 गुना से अधिक नहीं हो सकता है।
प्राइस बैंड में संशोधन हो सकता है लेकिन इसकी जानकारी स्टॉक एक्सचेंज के जरिये प्रसारित की जा सकती है। इसे प्रेस रिलीज जारी कर बताना होगा। साथ ही बुक बिल्डिंग प्रक्रिया में हिस्सा लेने वाले कारोबारी सदस्यों की वेबसाइट और ट्रेडिंग टर्मिनल पर भी इसकी जानकारी देनी होगी। अगर प्राइस बैंड में संशोधन होता है तो शेयर के लिए बोली लगाने (बिडिंग पीरियड) तीन तक बढ़ाई जाती है। हालांकि बिडिंग पीरियड दस दिन से ज्यादा का नहीं हो सकता। क्रेडिट कंट्रोल क्रेडिट कंट्रोल का इस्तेमाल वे कंपनियां करती हैं जो अपने कारोबारी कर्जदारों से समय पर इसका भुगतान चाहती हैं। क्रेडिट कंट्रोल कंपनियों के डूबत ऋण के जोखिम को काफी कम कर देता है। क्रेडिट कंट्रोल के दौरान कंपनियां कई मानदंडों का इस्तेमाल करती हैं। सबसे पहले उन ग्राहकों के ऋण क्षमता का अंदाजा लगाया जाता है। यह पता किया जाता है कि फलां ग्राहक को कितना कर्ज दिया जाए, जिसे वह समय पर चुका सके। साथ ही ऋण देने की शर्तें तय की जाती है।
ऋ ण चुकाने में ऐसे ग्राहकों को प्रोत्साहित करने के लिए डिस्काउंट भी दिया जाता है। साथ ही बकाये रकम की मॉनिटरिंग की जाती है। साथ ही इसे रिकार्ड में भी रखा जाता है। दरअसल कारोबार मे ग्राहक कंपनियों का ऋण देना एक आवश्यक रणनीति है। हालांकि प्रभावी क्रेडिट कंट्रोल से डूबत ऋण का जोखिम काफी कम हो जाता है। इससे ऋण देने वाली कंपनी की लाभप्रदता और तरलता दोनों संतुलित रहती हैं। बैंक और वित्तीय संस्थान क्रेडिट कंट्रोल के लिए केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीतियों का इस्तेमाल करते हैं। इससे अर्थव्यवस्था में खर्च का स्तर भी नियंत्रित किया जाता है। मौद्रिक नीतियों के जरिये भी सार्वजनिक व्यय में बढ़ोतरी की जाती है।
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